मंगलवार, 17 मार्च 2009

क्या इस्लामी दुनिया आतंकवाद का समर्थक है?

इस समय पूरी दुनिया इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पूरा इस्लामी समुदाय आतंक का पोषक है. क्या इस्लामी दुनिया का बड़ा हिस्सा आतंकवाद का समर्थक है? अगर ऐसा नहीं है तो इस्लामी दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? पूरी दुनिया को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि इस्लामी समुदाय का बहुसंख्यक हिस्सा आतंकवाद का समर्थन करनेवाले बहावी, देवबंदी, अहले हदीस की विचारधारा को नहीं मानता?
बहावी, अहले हदीस और देवबंदी मूलतः सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के सत्ता प्रतिष्ठान से समर्थन पाते हैं. इन सब मस्लकवालों की बरेलवियों से ठनी रहती है. शुरू के दौर में इस्लाम में धर्म की व्याख्या कई इमामों ने की थी. इनमें अबू हनीफा मुख्य थे. उनके बताये तरीकों पर चलनेवाले हनफी कहलाए. बरेली के इमाम अहमद रजा भी हनफी थे. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफियों का जोर है. अहले हदीस, देवबंदी और बहावियों का एतराज है कि हनफी बरेलवियों के मुल्ला मौलवियों ने अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए जाहिल मुसलमानों को बहका दिया है.
पेट्रो डालर के बल पर संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब से प्रचारित होनेवाला और जमीयते इस्लामी, तालिबान, अल-कायदा, सिमी जैसे संगठनों के माध्यम से पूरी दुनिया में आतंक का बारूद बिछानेवालों की कौम इस्लामी दुनिया में अल्पसंख्यक हैं. पेट्रो डालर आज भी इमाम अबू हनीफा के हनफी संप्रदाय की तुलना में काफी छोटा है. हनफी समुदाय मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन के इस्लाम का समर्थन तो दूर उनसे नफरत करता है और उन्हें मुसलमान मानने को भी तैयार नहीं. पश्चिमी देशों के अलंबरदार इस हकीकत को क्यों नजरअंदाज कर रहे हैं?
दरहकीकत मुसलमान तो सभी हैं, मगर इनमें इबादत के तरीके मुख्तलिफ हैं। मोटे तौर पर इस्लामी जगत में शिया और सुन्नी नामक दो फिरके हैं. इन दोनों के बीच चौथे खलीफा हजरत अली के जमाने से इख्तिलाफ चला आ रहा है. एक ही खुदा, एक ही कुरान और एक ही पैगम्बर को मानते हुए दोनों फिरके आपस में रंजिश रखते चले आये हैं. इराक इरान की दुश्मनी शिया और सुन्नी की दुश्मनी का सबसे बड़ा प्रतीक है. इराक के खात्मे और इस्लामी जगत की सियासत में इस्लाम के हाशिये पर चले जाने के बाद से शिया और सुन्नी के बीच वारदात की घटनाएं कम हो गयी हैं. पर आज भी बहुसंख्यक मुसलमान शिया समुदाय से नफरत करता है और उनको अपमानित करने के लिए खटमल जैसे शब्दों का प्रयोग करता है. बहुसंख्यक सुन्नी या हनफी समुदाय के लिए आजकल टीटीएस शब्द का प्रचलन है.इसका उदय अहमद रजा बरेलवी की प्रेरणाओं से उनके अनुयायिओं के द्वारा हुआ, इस संचिप्त नाम टी टी एस का पूरा रूप है तहरीके तहफ्फुज सुन्नी इसका अपभ्रंस टीटीएस का मतलब लोग मजाकिया लहजे में भी कहते हैं- टकाटक सुन्नी.
देवबंदी या बहावी चूंकि खुद शुद्ध मुसलमान होने का दावा करते हैं इसलिए उनके लिए '२४ नंबरी' की उपाधि प्रचलित है. यह २४ का आंकड़ा २४ कैरेट सोने से उठाया गया है. चूंकि शियाओं से सुन्नियों का विवाद शतकों पुराना है इसलिए उनकी मस्जिदें भी अलग-अलग होती हैं. अब इस्लामी जगत का असल झगड़ा सुन्नियों के आपस का है. सुन्नियों में ही अब सुन्नियों के बीच एक दूसरे से अलग मस्लक-तरीके प्रचलित हो गये हैं. इनमें बहावी, अहले हदीस, देवबंदी और बरेलवी संप्रदाय हैं.
बहावी, अहले हदीस और देवबंदी मूलतः सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के सत्ता प्रतिष्ठान से समर्थन पाते हैं. इन सब मस्लकवालों की बरेलवियों से ठनी रहती है. शुरू के दौर में इस्लाम में धर्म की व्याख्या कई इमामों ने की थी. इनमें अबू हनीफ मुख्य थे. उनके बताये तरीकों पर चलनेवाले हनफी कहलाए. बरेली के इमाम अहमद रजा भी हनफी थे. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफियों का जोर है. अहले हदीस, देवबंदी और बहावियों का एतराज है कि हनफी बरेलवियों के मुल्ला मौलवियों ने अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए जाहिल मुसलमानों को बहका दिया है. परिणामस्वरूप मुसलमान कई खराबियों के शिकार हो गये हैं. उनका आरोप है कि हिन्दुस्तान जैसे मूर्तिपूजक देश के असर से बरेलवी मुसलमान भी कब्रों और मजारों को पूजने लगे हैं. वे भोजन पर मंत्र पढ़ते हैं, नजरों-नियाज दिलाते हैं, मोहर्रम गमजदा मनाने के बजाय जश्नों और मौज मस्ती के साथ प्रदर्शन करते हैं और पैगम्बर मोहम्मद साहब यानी नबी के जन्मदिन पर बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं. उनका आरोप है कि बरेलवियों ने गैर मुस्लिमों के तौर-तरीके और रस्मो-रिवाज अपना रखे हैं जो कि इस्लाम की रू से नाजायज और हराम है.मान्यता के मुताबिक इसलाम नाम ही है गैब पर ईमान यानि एतमाद करना, एक ही आराध्य जो अदृश्य और सर्वव्यापी है कि अद्रीश्य सत्ता को मानना . लेकिन बरेलवियों का यह फलसफा है कि अल्लाह तक पहुँचने के लिए बीच में माध्यम की आवश्यकता है जो रूह्पोश हो चुके बुजुर्ग हैं, और यही मान्यता उन्हें माजारर्परस्ती के लिए छूट देता है.
दरअसल भारत में इस्लाम फारस, अरब, अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से आये. फारस, अफगान और तुर्की में हनफी संप्रदाय का व्यापक असर था इसलिए हिन्दुस्तान के इस्लामी सत्ताधीशों ने हनफी संप्रदाय के सूफियों को प्रश्रय दिया. आज भी बरेलवी मुसलमानों की सूफी परंपरा में चिश्तिया, नक्शबंदिया, कादरिया और सुहराबर्दिया सिलसिला प्रचलित है. इनमें चिश्ती सिलसिला देश के छोटे-छोटे गांव में भी मिल जाएगा.
भारत में चिश्तिया सिलसिला अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से शुरू होता है. उनका जन्म ११४२ में अफगानिस्तान में हुआ था. वे ११९२ में मोहम्मद गोरी की सेना के साथ भारत आये थे. ११९५ में वे अजमेर में बस गये. वहीं उन्होंने पर्दा किया (समाधि ली). हम हिंदाल वाली ख्वाजा गरीब नवाज मोईनुद्दीन चिश्ती के उपदेशों को अगर गौर करें तो उनकी शिक्षा दूर दूर तक वर्तमान मजार परस्ती का रत्ती भर भी संकेत नहीं देता है. उन्हों ने तो सिर्फ और सिर्फ एक अल्लाह के इबादत और दुनिया में उसके द्वारा भेजे गए लाखों दूतों, पैगम्बरों और नबियों को मानते हुए चार आसमानी किताबों के उपदेशों को अपना रहबर बताते हुए इस पर आस्था रखने के सीख दी है. हाँ इसलाम ने ऐसे महापुरुषों के मजारों की जियारत और उनके तुफैल में अल्लाह से दुआओं के दरख्वास्त के इजाजत अवश्य दी है. कहा है की अल्लाह के ऐसे बन्दे दुनिया से पर्दा भर कर जाते हैं उन्हें म्रत्यु नहीं आती है लिहाजा हमें इस बात को मानकर चलने के हिदायत भी इसलाम देता है.
गरीब नवाज ने जहां पर्दा किया उस दरगाह की ख्याति वैश्विक है. यहां जिन चार सूफी संतों का जिक्र है वे सभी इस्लामी हमलावरों के साथ आये थे लेकिन हिन्दुओं के भक्तिमार्ग के साथ समन्वय बनाकर इस्लाम का प्रसार किया. यहां यह भी जान लीजिए कि इस्लामी उलेमाओं का हमेशा इनके साथ मतभेद बना रहा. सिर्फ शरीयत ने सूफी और उलेमा के बीच अंतरसंबंध बनाये रखने का काम किया.

लेकिन धीरे-धीरे भारत में सूफी रहस्यवाद को माननेवाले मुख्यधारा बन गये. शेख अहमद सरहिन्दी, शाह वलीउल्लाह, सैयद अहमद बरेलवी, करामत अली, सर सैयद अहमद खान, अल्लामा इकबाल, ये सभी हनफी यानी बरेलवी यानी सूफी रहस्यवाद की परंपरा के समर्थक विद्वान हुए.
अकबर के आखिरी दिनों में शेख सरहिन्दी ने समकालीन संतों गुरूनानक और संत कबीर के खिलाफ अभियान चलाया था. सरहिन्दी ने हिन्दुओं पर जजिया कर जजिया कर हटाये जाने का विरोध किया और अकबर के व्यापक दृ्ष्टिकोण की निंदा कर अकबर द्वारा भ्रष्ट किये जा रहे इस्लाम के शुद्धिकरण का अभियान भी चलाया था. जब जहांगीर ने सरहिन्दी के तेवर में बगावत देखी तो उसे ग्वालियर में गिरफ्तार करवा दिया. साल भर बाद सरहिन्दी कैद से रिहा किये गये. तब तक सरहिन्दी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बैर का बीज बोने में कामयाब हो चुके थे.

सरहिन्दी की ही तरह नक्शबंदी समुदाय के दूसरे आलिम शाह वलीउल्लाह ने हिन्दूद्रोही अभियान चलाया. शाह वलीउल्लाह अठारहवीं सदी में मराठों और जाटों के बढ़ते प्रभाव से क्षुब्ध थे. उन्होंने १७५० के दशक में इस्लाम की रक्षा के लिए अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली को दिल्ली पर कब्जा करने का निमंत्रण दिया था. सैयद अहमद बरेलवी इन्ही वलीउल्लाह के पुत्र अब्दुल अजीज के मुरीद हुए. सैयद अहमद बरेलवी ने गैर-इस्लामी शासकों के खिलाफ इस्लामी जिहाद शुरू किया. वह बालकोट की लड़ाई में सिख राजा रंजीत सिंह के हाथों मारा गया. सैयद अहमद बरेलवी के मुरीद करामत अली ने इस्लाम को हिन्दू प्रभाव से मुक्त कराने का अभियान आगे बढ़ाया था. करामत अली के इस्लामी दर्शन पर ही वर्तमान अहले हदीस संप्रदाय की नींव पड़ी है. शाह वलीउल्लाह और वहाब की विचारधारा के आधार पर देवबंद की नींव पड़ी. अरब के देश शुद्ध इस्लाम यानी वहाबी, अहले हदीस और देवबंदी फिरकों के पोषक हैं. पिछले दो दशक से यही वर्ग पेट्रो डालर के बल पर पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में गरीब हनफियों को देवबंदी बनाने में जुटी हुई है. इसी तब्लीग के माध्मय तालिबान की पैदाईश हुई. अगर अठारहवीं सदी में शाह वलीउल्लाह अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को बुलाकर मराठों, जाटों, सिक्खों और चिश्तियों का कत्ल करना चाहते थे तो आज वही काम देवबंद के शरीफ आलिम ओसामा और मुल्ला उमर के लड़ाकों के जरिए करवा रहे हैं. निश्चित रूप से इनसे लड़ने के लिए कौम से ही अबू हनीफा, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा बकी और बहाउद्दीन जकरिया के मुरीदान को जगाना होगा .
आज इस बात को समझना काफी जरूरी है की बरेलवी और देवबंदी मुस्लमान अगर यूं ही एक दूसरे को शैतान का संबोधन देते हैं वो हर हाल में आपसी द्वेशात्मकता को मजबूती की ओर धकेल रहा है जो किसी भी लिहाज से सही नहीं है.इन देवबंदियों और बरेलवियों की आपसी तकरार ने आज सचमुच इस्लाम की तमाम आदर्शों पर कालिमा लपेटे जा रहा है और सद्भावना ,आपसी प्रेम और भाईचारगी के पैगाम जिसे इसलाम के जरिये और पैगम्बरों के द्वारा कुदरत ने जमीन पर भेजा है वो आज आसमान और जमीन के बीच झूल रहा है और धरती पर गिरती जा रही मानवता को सुधारने की दवा के रूप में सर जमीन पर आने को बेताब है . यकीनन हिंद की जमीन ए पाक अजमेर पर पर्दानशीं ख्वाजा गरीब नवाज की आत्मा आज जरूर विचलित होते होगी के उन्होंने जो सबक अपने मुरीदों को दिए उसपर ओढे जाने वाली चादरें कितनी मैली हो गई है, उसकी सफाई करने की बजाये कितना बदरंग कर रहे हैं? जहाँ खुदा के सच्चे और समर्पित सेवक खुदाई रंगीनियाँ बांटने को तईयार हैं वहां देने ईमान को धक्कम-धुक्का से दो चार होना पड़ रहा है.
रही बात आतंकवाद और दहशतगर्दी की तो हम कह सकते हैं कि मुसलमानों के बीच आपसी भाईचारगी का दूर होता जाना इन आरोपों को मत्थे चढा रहा है. आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए, भले ही वो कोई इंसान करे, संगठन करे या फिर कोई सरकार करे, लेकिन इसे मज़हब से जोड़े जाने को किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। गौरतलब है कि 'इस्लाम' शब्द अरबी भाषा के 'सलाम' शब्द से निकला है, जिसका मतलब है सलामती, अमन। ऐसी हालत में आख़िर किस बिनाह पर कहा जा सकता है कि इस्लाम दहशतगर्दों को पनाह देता है। क़ुरान में कहा गया है कि ''वह (अल्लाह) ऐसा माबूद है कि उसके अलावा कोई दूसरा माबूद नहीं है, वह शहंशाह है, पाक है, सलामती और अमन देने वाला निगरां है।'' (क़ुरान: 59:23) कुरान में जगह-जगह लोगों को सब्र करने और माफ़ करने की ताक़ीद की गई है। क़ुरान में 85 जगह अल्लाह को माफ़ करने वाला कहा गया है। अल्लाह ने अपने नबी से कहा है कि ''ऐ पैगम्बर! ईमान वालों से कह दो कि वे उनको भी माफ कर दिया करें जो अल्लाह के कर्म परिणामों की उम्मीद नहीं रखते, ताकि लोगों को उनकी करतूतों का बदला मिले। जो कोई अच्छा काम करता है तो अपने लिए ही करेगा और जो कोई बुरा काम करता है तो उसका बवाल उसी पर होगा। फिर तुम अपने रब की तरफ़ लौटाए जाओगे।'' (क़ुरान 45 : 14-15) ''बुराई को भलाई से दूर करो'' (क़ुरान 28 :54) ''और जो शख्स सब्र से काम ले और दूसरे के कसूर को माफ़ कर दे तो बेशक यह बड़ी हिम्मत का काम है।'' (क़ुरान 42 :43) ''बेशक अल्लाह तुम्हें इंसाफ़ और नेक काम करने का हुक्म देता है।'' (क़ुरान 16 :90) ''तुम में जो श्रेष्ठ और सामर्थ्यवान हैं, वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह के रास्ते में घरबार छोड़ने वालों को कुछ न देने की क़सम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि माफ़ कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला और रहम करने वाले है।'' (क़ुरान 24 :22) क़ाबिले-गौर यह भी है कि मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि जब किसी पैगम्बर का नाम सुनो तो उसके साथ 'अलैहिस्सलाम' कहो। इसका मतलब है उन (पैगम्बर) पर सलामती और अमन हो। जब मुसलमान आपस में मिलते हैं तो एक-दूसरे को सलाम करते हैं, जिसका मतलब भी अमन और सलामती ही है। जन्नत में भी लोगों को सलामती के ही शब्दों से पुकारा जाएगा। इस बारे में कहा गया है कि ''और उनका परस्पर सलाम यह होगा कि अमन और सलामती हो तुम पर।'' (क़ुरान:10:10)
कुरान के इस उपदेश को भी गौर करें ''भलाई और बुराई बराबर नहीं है। अगर कोई बुराई करे तो उसका जवाब भलाई से दो। फिर तुम देखोगे कि तुम्हारा दुश्मन ही तुम्हारा गहरा दोस्त बन गया है। और यह गुण उन्हीं को मिलता है जो सब्र करने वाले हैं और जो बेहद खुशनसीब हैं। अगर इस बाबत शैतान के उकसाने से तुम्हारे अंदर कोई उकसाहट पैदा हो जाए तो अल्लाह की पनाह तलाश करो। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है।'' (क़ुरान 41 : 34-36)

अब्दुल्ला

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